उत्तराखंड का सुप्रसिद्ध लोकपर्व हरेला केवल एक सांस्कृतिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति, हरियाली, कृषि परंपरा और पर्यावरण संरक्षण के प्रति हमारी आस्था एवं जिम्मेदारी का प्रतीक है। हरेला का अर्थ है हरियाली का दिन, जो मानव और प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखने तथा धरती को हरा-भरा बनाने का संदेश देता है।

हरेला पर्व के पावन अवसर पर अमर ज्योति बाल संस्थान, ऋषिकेश में एक भव्य एवं प्रेरणादायी कार्यक्रम का आयोजन किया गया। यह कार्यक्रम संस्थान के संस्थापक  रशमी कांत तथा बहुभाषी लेखक, समाजसेवी एवं शिक्षाविद् धर्मसिंह फरस्वाॅण (जनपद चमोली, गढ़वाल, उत्तराखंड) के सौजन्य से संपन्न हुआ।

कार्यक्रम में उत्तराखंड एवं यूरोप के विभिन्न शिक्षण संस्थानों के विद्यार्थियों ने उत्साहपूर्वक पौधारोपण कर पर्यावरण संरक्षण का सशक्त संदेश दिया। विद्यार्थियों ने हरेला पर्व की शुभकामनाएँ देते हुए संकल्प लिया कि वे स्वयं भी अधिक से अधिक पौधे लगाएंगे और समाज के प्रत्येक व्यक्ति को तन, मन, धन, वचन एवं कर्म से पर्यावरण संरक्षण के इस महायज्ञ में सहभागी बनने के लिए प्रेरित करेंगे।

इस अवसर पर बहुभाषी लेखक, समाजसेवी एवं शिक्षाविद् धर्मसिंह फरस्वाॅण ने कहा कि आज सम्पूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन, ग्लोबल वार्मिंग, वनों की अंधाधुंध कटाई, प्रदूषण, जैव विविधता के क्षरण और प्राकृतिक संसाधनों के तेजी से हो रहे दोहन जैसी गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाली पीढ़ियों को स्वच्छ वायु, शुद्ध जल और सुरक्षित पर्यावरण उपलब्ध कराना कठिन हो जाएगा।

कार्यक्रम का मुख्य उद्देश्य विश्व समुदाय को यह संदेश देना था कि उत्तराखंड का लोकपर्व हरेला केवल एक क्षेत्रीय परंपरा नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए प्रकृति संरक्षण का वैश्विक अभियान बन सकता है। इस अवसर पर विश्व के सभी देशों के नागरिकों से भावपूर्ण अपील की गई कि वे हरेला की भावना से प्रेरणा लेकर अपने-अपने देशों में व्यापक स्तर पर पौधारोपण अभियान चलाएँ तथा लगाए गए पौधों का संरक्षण भी सुनिश्चित करें।

कार्यक्रम के दौरान बहुभाषी लेखक, समाजसेवी एवं शिक्षाविद् धर्मसिंह फरस्वाण ने भारतीय भाषा, संस्कृति एवं वैश्विक शैक्षिक सहयोग को प्रोत्साहित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल करते हुए अपनी रचित फ्रेंच, अंग्रेजी एवं हिन्दी भाषा सीखने संबंधी पुस्तकों को विद्यार्थियों एवं शिक्षकों को भेंट किया। उन्होंने कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं, बल्कि विभिन्न देशों की संस्कृति, सभ्यता और मानवीय मूल्यों को जोड़ने वाला एक सशक्त सेतु है।

उन्होंने यूरोप के विभिन्न देशों के विद्यार्थियों से हिन्दी भाषा सीखने का आह्वान करते हुए कहा कि हिन्दी का अध्ययन भारत की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत, साहित्य, इतिहास और परंपराओं को समझने का प्रभावी माध्यम है। उन्होंने विश्वास व्यक्त किया कि हिन्दी भाषा के प्रति बढ़ती रुचि भविष्य में यूरोप और भारत के बीच शिक्षा, सांस्कृतिक आदान-प्रदान, पर्यटन, शोध एवं अकादमिक सहयोग को नई ऊँचाइयों तक पहुँचाएगी। साथ ही अधिक से अधिक यूरोपीय विद्यार्थी भारत आकर अध्ययन, शोध, पर्यटन एवं भारतीय संस्कृति का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त करेंगे, जिससे दोनों क्षेत्रों के बीच मैत्री, पारस्परिक समझ और वैश्विक सहयोग को और अधिक सुदृढ़ता मिलेगी।

अमर ज्योति बाल संस्थान संस्थापक  रशमी कांत ने कहा कि यदि विश्व का प्रत्येक नागरिक प्रतिवर्ष कम-से-कम एक पौधा लगाकर उसके संरक्षण का संकल्प ले, तो करोड़ों नए वृक्ष पृथ्वी की हरियाली बढ़ाने, कार्बन उत्सर्जन कम करने, जैव विविधता को संरक्षित करने तथा जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। पर्यावरण संरक्षण किसी एक देश, समाज या संस्था का दायित्व नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता की साझा जिम्मेदारी है।

कार्यक्रम के अंत में उपस्थित सभी विद्यार्थियों एवं शिक्षकों ने सामूहिक रूप से पर्यावरण संरक्षण की शपथ लेते हुए अधिक से अधिक पौधारोपण करने, वृक्षों की रक्षा करने तथा इस संदेश को घर-घर और विश्व के कोने-कोने तक पहुँचाने का संकल्प लिया।

By admin

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *